Development of rural areas
पशु पालन विभाग और ग्रामीण इलाको की तरक्की
जैसा की हम सब जानते है कि भारत की 70% जन्संख्या 2011 कि जनगणना के अनुसार गांव में रहती है और उसका गुजर बस्सर खेती और पशु पालन से होता है। खेती पशु पालन के लिए जरुरी है। और पशु पालन बिना खेती अधुरी है। खेतीबाड़ी से हमे खास मौसम पर ही फसल तैयार होने पर आमधणी प्राप्त होती है। जबकि पशु पालन से हमे लगातार आमधनी प्राप्त होती है। बड़ती जनसख्या के साथ हमारी जमीन खेती बाड़ी के लिए कम पड़ती जा रही है। तो यह जरुरी है की हम उच्च नसल के ही कम पशु पाल कर दूध की ज्यादा से ज्यादा पैदावार हासिल करें जिससे हमारी ग्रामीण जनसख्या को अच्छी खुराक दूध, दही, मक्खन, घी और लस्सी की सूरत उपलब्ध हो और पशु पालन से हमारे किसानों की अच्छी आमधनी भी प्राप्त होती है। दूध की ज्यादा उत्पादन हासिल करने के लिए सरकार की तरफ से पशु पालन विभाग बनाया गया है जिसकी वजह से भारत दुनियाभर में दूध के उत्पादन में प्रथम स्थान प्राप्त क्र चूका है।
अच्छी नस्ल के दुधारू पशु की पहचान उनकी देखभाल और उनसे दूध का अच्छा उत्पाधन प्राप्त करने के लिए जरुरी जानकारियाँ पशु पालन विभाग की तरफ से इस छोटी सी किताब में दी गयी है।
स्वस्थ पशु की निशानियाँ
एक पशु की अच्छी सेहत की निशानियाँ जानना बहुत जरुरी है। जोकि निम्मनलिखित व्यक्त की गई है।
1. स्वस्थ पशु की चमड़ी चमकीली और ढीली होनी चाहिए।
2. स्वस्थ पशु चुस्त और फुर्तीला होता है। और शेड (Shed ) में गैर जरुरी आवाज या शोर शराबा सुनने पर चौकन्ना हो जाता है।
3. स्वस्थ पशु अपने शरीर पर मक्खियाँ नहीं बैठने देता। और ऐसी हालत में वो अपनी दुम्ब हिला - हिला कर मक्खियॉं को बगा देता है।
4. स्वस्थ पशु की पीठ थप्पा - थ्प्पाने पर वो थर - थराता है।
5. स्वस्थ पशु के आगे समान्यता जो भी खुराक डाली जाती है वो सारी खा लेता है।
6. स्वस्थ पशु का नाक हमेशा गीला रहता है।
7. स्वस्थ पशु का शारीरिक तापमान 100 से 101 F होता है।
8. स्वस्थ पशु दिन में 15 - 20 kg नरम गोबर करता है।
9. स्वस्थ पशु का पिशाव हलके पीले रंग का रहता है।
ऊपर लिखी गई सभी बातों पर खास ध्यान रखना चाहिए और अगर उनमें कोई भी बदलाब दिखाई दे तो यूँ समझ लो कि जानवर को कोई तकलीफ जरूर है और उसकी जाँच निकटतम बेटनरी सेंटर से अव्श्य करायें।
अच्छे दुधारू पशु की पहचान
एक डेरी फार्म वाले को अपनी ही गायों या बैंसो का झुंड कृत्रिम गभार्धान (Artificial Insemination ) के द्वारा जो कि एक अच्छी नस्ल के बैल से तैयार किये जाते है से ही करना चाहिए। कई बार फोरी तौर पर हमे डेरी फार्म का काम करना है तो दुधारू पशु खरीदने पड़ते है तो ऐसी हालत में कुछ बातों का ध्यान रखना जरुरी है। जो निम्मनलिखित है।
1. हो सके तो जानवर की पहचान के लिए उसकी अच्छी तरह जाँच पड़ताल करें।
2. कोशिश करें की जानवर बुड्ढा ना हो और लगभग उसने दूसरी बार बच्चा दिया हो।
3. जानवर का पल्ला ध्यान से देखे और महसूस करे। महसूस करते वक्त वो हमे नरम और रुईवार (Spongy) लगना चाहिए।
4. जानवर खरीदने से पहले 3 दिन उसके दूध की परख कर लें और तब ही उसके दूध की औसत उत्पादन तय करे।
5. थन अपनी अपनी जगह पर बराबर दुरी पर हों और ज्यादा लम्बे न हों।
6. पल्ले से दिल की तरफ खून लेने वाली नाड़ियां जिन्हे आम तोर पर लोग दूध वाली नाड़ियाँ कहते है वो मोटि, लम्बी और टेडी मेडी होनी चाहिए।
7. पशु चुस्त, चमकीला और आँखों से होशियार लगना चाहिए और नाक गिला होना चाहिए।
8. पशु की चमड़ी नरम और पतली होनी चाहिए।
9. पशु न ज्यादा मोटा और ना ज्यादा दुबला होना चाहिए उसकी आखिर की तीन पसलियाँ दिखाई देनी चाहिए और छाती चौड़ी होनी चाहिए।
दुधारू पशु का पालन पोषण
दुधारू पशु के पालन पोषण की जरुरी बाते।
1. अच्छा माहौल 2. अच्छी देखभाल 3. अच्छी खुराक 4. बीमारीयों की रोकथाम
1. अच्छा माहौल :- दुधारू पशु से अच्छा फायदा लेने के लिए उसे अच्छा माहौल उपलब्ध करवाना जरुरी है। अच्छे माहौल के लिए अच्छे शेड (Shed ) का होना जरुरी है जिसके लिए निम्मनलिखित बाते ध्यान में रखे :
1. शेड का फर्श जमीन से थोड़ा ऊँचा होना चाहिए।
2. फर्श पक्का और खुरदुरा होना चाहिए।
3. फर्श पर उठने और बैठने के लिए जानवर को सही मात्रा में जगह मिलनी चाहीये।
4. एक दुधारू गाए को खड़ा होने के लिए लम्बाई में 7 फुट और चौड़ाई में 4 फुट जगह उपलब्ध होनी चाहिए। ७ फुट ९ इंच छोड़ी पक्की नाली गोबर और मूत्र के लिए जरुरी है।
5. जानवर के लिए खुरली (Manger ) पक्की होनी चाहिए।
6. दुधारू जानवर का शेड हवादार होना चाहिए।
7. इलाके के हिसाब से शेड की ऊंचाई होनी चाहिए।
8. शेड की दीवारे मुलायम होनी चाहिए जिसमे दरारे आदि ना हों।
9. दुधारू पशु को साफ पानी उपलब्ध करवाए।
दुधारू पशु कि सही देखभाल
1. दुधारू पशु के साथ दोस्ताना सलूक रखें।
2. पशु आपके सलूक से अच्छा अनुभब करें।
3. शेड का फर्श दूध लेने से पहले अछि तरह साफ़ करें।
4. पशु की साफ सफाई का खास ध्यान रखे।
5. दूध लेने से पहले दुधारू पशु के पल्ले (Udder ) को अच्छी तरह साफ़ पानी से धो ले और सुखा लें और अपने साफ़ हाथो से दूध लें।
6. दूध लेने के तुरन्त बाद गाय को खुराक डालें ताकि बह दूध देने के बाद तुरंत ना बैठे।
7. गाय का शरीर रोज़ाना ब्रश से साफ़ करें ताकि उसके शरीर पर जूं चिचड़ी आदि ना पड़े और गाय स्वस्थ रहे।
8. जब हम गाय से दूध लेते है तो इस बात का धयान रखे की पल्ला (Udder ) पूणर्ता खाली हो जाए और पूरा दूध लेने के लिए खास ध्यान रखे की दाएं हाथ से काम करने वाला मनुष्य दूध लेते वक्त गाय के बाएं तरफ और बाए हाथ से काम करने वाला मनुष्य गाय के दाएं तरफ बैठ कर दूध ले ताकि सारा दूध 8 मिनट के अंदर निकाला जा सके।
दुधारू पशु कि खुराक
1. एक दुधारू पशु से अच्छा दूध लेने के लिए उसे अच्छी खुराक दें।
2. जहां तक सम्भब हो दुधारू गाय को पेट भरकर हरा चारा खिलाएं।
3. हरा चारा न मिले तो दुधारू जानवर को अच्छे प्रकार का सूखा घास या साफ़ भूसा खिलाएं।
4. अच्छी प्रकार की संतुलित आहार का खास ख्याल रखे और 2 से 3 किलो ग्राम्स दूध के लिए 1 किलो संतुलित आहार खिलाएं।
5 एक दुधारू पशु को संतुलित आहार के अतिरिक्त दिन में 40 ग्राम्स मिनरल्स मिक्चर अवश्य खिलाएं।
6. खल खरीदने से पहले यह जान लें कि वह ज्यादा पुरानी ना हो , ओर उसे घर में गीली जगह पर ना रखे।
7. आहार के साथ- साथ दुधारू पशु के लिए दिन में 100 लीटर पानी की जरूरत होती है जिस से पीने ओर सफाई की जरूरत पूरी हो जाती है।
दुधारू पशुओं में बीमारियों की रोकथाम
कीटाणुओं से फैलने वाली बीमारिया :-
1. फर्रा रोग (black Quater ) : यह बीमारी आमतौर पर स्वस्थ जवान पशुओं में बरसात के दौरान पाई जाती है जिसमें तेज़ भुखार होना, टांग में लगड़ापन आना और उसी टांग के ऊपरी भाग में सूजन होना जिसे दवाने पर चर- चर की आवाज़ आना और तुरंत इलाज ना मिलने पर जानवर का मर जाना शामिल है। इस रोग से बचने के लिए आवशयक हे कि बरसात शुरू होने से पहले जानवरो को रक्षक टिके लगवाए जाएं।
2. गला घोट (H.S) :- यह रोग सभी आयू वर्ग के जानवरों में पाया जाता है। इसमें भी तेज भुखार होना , नमोनिया और दस्त लगना शामिल है। कभी कभार गले में सूजन होना जिस से सांस लेने में परेशानी आती है और तुरंत इलाज ना होने पर जानवर मर जाता है। इस रोग के निदान के लिए साल में दो बार रक्षक टीके (Vaccine) जरूर लगवाए।
3. मोखर (F. M. D) :- यह रोग एक कीटाणु (Virus ) से होता है जिसमें पशु के मुँह और खुरों में सूजन हो जाती है ओर छाले पड़ जाते है। अगर वरसात के मौसम में यह रोग हो जाएँ तो खुरो में कीड़े तक पड़ जाते है ओर दूध के उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है। इस रोग से आमदनी में बुरा प्रभाव पड़ता है ओर इस रोग के निदान लिए साल में दो बार रक्षक टिके (Vaccine ) लगवांएं।
आंतरिक ओर बाहरी कीड़ो की रोकथाम
आंतरिक ओर बाहरी कीड़ों की जानकारी एक दुधारू जानवर पालने वाले के लिए आज के दौर में बहुत आवश्यक है। अगर इस बात को महत्व न दिया जाए तो हम आर्थिक हानि का शिकार हो जाते है।
आंतरिक कीड़े दो प्रकार के होते है - एक जो अंतड़ियो में पाए जाते है और दूसरे वह जो जिगर में पाए जाते है। ऊपर वर्णित कीड़ों से आमतौर पर पशु दस्त का शिकार हो जाते हैं ,कमजोर भी हो जाते है जिस से दूध के उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है और कई बार पशु मर भी जाते है। आंतरिक कीड़ों की शिकायत के निदान के लिए आवश्यक कि हम जहां तक सम्भब हो सके साफ़ पानी पिलायें। पशु के कमजोर और सुस्त दिखने पर निकटतम चिकित्सालय में गोबर की जाँच करवाएँ और उसके अनुसार ही सही दवाई का प्रयोग वेटनरी कर्मचारी की सिफारिश पर ही करें ।
बाहरी कीड़े जैसे जूं, चिचड़, पिस्सू आदि भी दुधारू पशु के लिए काफी हानिकारक होते है यह जानवर का काफी खून चूस लेते है जिस से जानवर कमजोर हो जाते है। और दूध के उत्पादन में काफी गिरावट आ जाती है कई बार यह कीड़े दूसरे रोगों के कीटाणुओं को एक पशु से दूसरे पशु में फैलते है जिस से हमे भारी आर्थिक हानि होती है बाहरी कीड़ों के निदान के लिए शेड की सफाई का विशेष ध्यान रखे और पशु को रोजाना ब्रश से साफ़ करें, ब्रश हमेशा प्लास्टिक का ही प्रयोग करें अगर ध्यान रखने पर भी पशु बाहरी कीड़ो का शिकार हो जाते तो निकटतम पशु चिकित्सालय से जरूर सलाह लेकर सही दवाई दें।
मस्टाईटिस अर्थात पल्ले की सूजन
यह रोग आमतौर पर ज्यादा दूध देने वाले पशुओ में पाया जाता है और बढ़ती उमर के साथ इस रोग का ज्यादा प्रभाव होता है यह रोग कीटाणु और पल्ले की चोट लगने के कारण होता है। इस रोग से पल्ला (udder) सख्त हो जाता है जिस से दूध का उत्पादन कम हो जाता है और कई बार सुझा हुआ थन हमेशा के लिए बेकार हो जाता है।
अक्सर यह पाया गया है कि दूध लेने के बाद थन के सुराख़ को पूरी तरह से बन्द होने के लिए 15 -20 मिनट का समय लगता है जिस दौरान इस रोग के कीटाणु का हमला करने का अंदेशा / सम्भाबना रहती है।
आज के दौर में इस बीमारी कि जानकारी और रोकथाम डेरी वाले के लिए बहुत ही जरुरी है क्योकि इस बीमारी का सीधा प्रभाव दूध के उत्पादन पर पढ़ता है इससे हमारी आमदनी पूरी तरह से नष्ट हो जाती है।
रोकथाम की जरुरी बातें
1. पल्ले कि सफाई का ध्यान दूध लेने से पहले और दूध लेने के बाद जरूर रखें।
2. दूध लेने वाला मनुष्य अपने हाथों की सफाई का खास ध्यान रखें और साफ हाथों से दूध निकाले।
3. शेड में फर्श की सफाई का खास ध्यान रखे क्योकि गंदे फर्श पर कीटाणु का ज्यादा अंदेशा रहता है।
4. दूध लेने के तुरंत बाद जानवर को आहार जरूर डाले ताकि जानवर खाने के लिए खड़ी हालत में रहे और थानों के सुराखों को बंद होने तक का समय आराम से निकल जाए लगभग 15 - 20 मिनट का होता है
5. दूध की मात्रा में कोई परिवर्तन दिखाई दे तो निकटतम पशु चिकत्सालय से सलाह ले।
कृतिम गर्भाधान (Artifical Insemination)
कृतिम गर्भाधान के दुआरा हम देसी नस्ल यानि कम दूध देने वाली गायो या बैंसो में अच्छी नस्ल के बैलो के बीर्य द्वारा ज्यादा दूध देने वाली गायें और बैंसें तैयार कर सकते है। कृतिम गर्भाधान से हम एक अच्छी नसल के बैल का प्राकृतिक ढंग की तुलना में कई गुना ज्यादा बच्चे तैयार कर सकते है।
कृत्रिम गर्भाधान के लिए हमे यह जानकारी होना बहुत जरुरी है कि टिका (A . I ) कब करवाना चाहिए और दुधारू पशुओं में गर्मी के क्या लक्षण होते है।
एक गाय को बच्चा देने के बाद 60 - 90 दिन के भीतर कृत्रिम गर्भाधाम हो जाना चाहिए। यह तभी सम्भब है जब हम पशु की देखभाल और आहार का खास ध्यान रखे।
गाय जब बच्चा देती है तो लोग अक्सर उसको 21 दिन तक केवल सूखा घास ही खिलाते है जिस से वो पशु निर्बल हो जाता है गर्मी में देर से आता है। इसके फालसाबरूप हमारी आमदनी पर बुरा प्रभाव पड़ता है इसलिए इस रस्म को खत्म करने की जरूरत है और एक दुधारू गाय को बच्चा जनने के बाद अच्छी खुराक प्रधान की जानी चाहिए जिसमे मिनरल मिक्सचर का प्रयोग भी जरुरी है।
गाविन पशु की खास देखभाल
एक गाविन (Pregnent ) गाय की खास देखभाल की जरुरी बातें : -
1. आखरी दो महीनो में बच्चे का शरीर ज्यादा से ज्यादा बढ़ता है जिस के लिए आवशयक है कि आखिर के दो महीनो में गाय का दूध बंद किया जाए।
2. दूध एक दम बंद नहीं करना चाहिए।
3. दूध बंद करने के लिए पशु को खाल और फीड आदि ताकतवर आहार जैसे खल , फीड, मिनरल मिक्सचर आदि।
4. अगर पशु ज्यादा दूध देने वाला है और फीड बंद करने के बाद भी दूध नहीं बंद कर रहा है तो उसे कुछ दिन के लिए पानी भी काम कर दे ताकि वह दूध बंद कर दे।
5. जब पशु दूध देना बंद कर दे तो आहिस्ता - आहिस्ता तो उसको ताकतवर आहार जैसे खल , फीड , मिनरल मिक्सचर आदि शुरू करें ताकि पशु स्वस्थ बन सके और एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देने के साथ - साथ अच्छा दूध भी दें।
6. आखिर सप्ताह में ताकतवर आहार 2 किलोग्राम के करीब कर दे ताकि जानवर बदहजमी का शिकार न हो जाए।
7. आखिर के 2 महीने में जब पशु ज्यादा भारी होने लगता है उसका खास ध्यान रखे। उसे दूसरे पशु से अलग कर देना चाहिए और सूखा घास बिस्तर के तोर पर उसके नीचे डालना चाहिए ताकि उठते समय फिसल न जाए।
8. रोज़ाना उसे ब्रश से साफ करे इससे पशु अच्छा आराम करता है।
9. गाय का बच्चा जनने का समय नजदीक आता है तो वह ज्यादा भारी लगने लगती है थन और पल्ला काफी बढ़ जाते है। और पल्ला काफी डिला हो जाता हैं तो उस समय ज्यादा से ज्यादा ध्यान दें और पशु को उची - नीची जगह पर चढ़ाई और उतराई से परहेज़ रखें।
दुधारू गाय और भैंस में गर्मी के लक्षण
1. पशु आहार खाना बंद कर देता है।
2. एक विशेष प्रकार की आवाज़ दिन भर निकालता रहता है।
3. पेशाव वाली जगह थोड़ी सूजी हुई लगती है।
4. पेशाव के रास्ते एक विशेष प्रकार की बेरंग सी तार निकलती है।
5. पशु बार- बार पेशाव करता है
6. गाय दूसरे पशुओं पर उछलती है और दूसरे पशुओ को अपने ऊपर उछलने के लिए बेताब रहती है।
7. उस दिन पशु कम दूध देता है
8. पशु के थन दिनभर भरे - भरे से लगते है।
9. भैंस ज्यादातर सर्दी के मौसम में गर्मी में आती है और अपनी गर्दन उठाकर दिनभर विशेष प्रकार की आवाज़ करती है और गाय की तुलना में लगातार थोड़ा - थोड़ा पेशाव करती रहती है।
ऊपर लिखे गए सारे लक्षण तभी देखने को मिलेंगे जब दुधारू पशु की देखभाल और आहार को हम प्राथमिकता दे।
जब पता चल जाए कि पशु गर्मी में आया है तो उसके बाद 12 से लेकर 18 घण्टे के भीतर कृत्रिम गर्भधान (A. I) करवाना चाहिए।
बछड़ो की देखभाल
एक बछड़े की सही सुरक्षा और देखभाल उसके जन्म से दो महीने पहले ही शुरू हो जाती है जब हम उसकी माँ के अच्छे आहार और देखभाल को महत्व देते है।
2. जन्म लेते ही बछड़े को खुरदुरे कपडे से साफ कर लेना चाहिए।
3. मुँह और नाक को अच्छी तरह साफ करें ले ताकि उसे साँस लेने में परेशानी न हो।
4. बछड़े को साफ़ और सुथरी जगा पर रखें।
5. सर्दी के मौसम में बछड़े को सर्दी से बचाएँ।
6. बछड़े का नाडु (नाभि) अगर ज्यादा लम्बा हो तो उसे लगभग एक इंच छोड़ कर साफ कैंची से काट ले और उस पर विटाडीन (Bitadine) नाम की दवाई लगा दें।
7. बछड़े को 1 घण्टे के अंदर ही माँ का पहला दूध पिलायें जिस से वह रोगरहित रहे और यह दूध अंतड़ियां साफ़ करने में सहायक सिद्ध होता है। और बछड़े के शरीर को रोगों से लड़ने में सहायक होता है।
8. बछड़े को पहले महीने वजन के 10 % के हिसाब से दूध पिलाएं दूसरे महीने 7 % और तीसरे महीने 5% के हिसाब से दूध पिलायें।
9. बछड़े को 10 -15 दिन के भीतर सींग निकलना बंद करवा दें। यह काम वेटनरी कर्मचारी से ही करवाएं।
10. बछड़े को 2 महीने की आयु में कीड़ें की दवाई (Deworming) अवश्य दें। भैंस के बच्चे को पहले ही महीने आंतरिक कीड़ो की दवाई दें।
डेरी फार्म के अंदर नए दुधारू पशु तैयार करना।
अक्सर देखा गया है कि चार सू (Lactation ) के बाद गाय का दूध कम होने लगता है और हमारी आमदनी में कमी आने लगती है। इसलिए बेहतर है कि आज के युग में पशु खरीद कर लाने के बदले अपने ही पशु त्यार किए जाएं । इसके लिए निम्मनलिखित बातों को ध्यान में रखें।
1. डेरी फार्म के अंदर छोटे बछड़ो विशेष रूप बछड़ियों के स्वस्थ का खास ध्यान रखे। दूध की मात्रा बछड़ो के बजन के अनुसार ही हो न कम ना ज्यादा।
2. 15 दिन की आयु से बछड़ियों को विशेष प्रकार की आहार आहिस्ता - आहिस्ता शुरू करना चाहिए जिसका फार्मूला है - मक्की 55 %, खल 35 % गदम का बुरा 8 % और मिनरल मिक्सचर 2 % और इस आहार को हम काफ सटाटर कहते है।
3. काफ स्टार्टर 15 दिन की आयु से प्रतिदिन 10 ग्राम्स की मात्रा से दें और आहिस्ता - आहिस्ता बढ़ाते जाए ताकि 6 महीने की आयु तक 1 किलो की मात्रा हो जाए।
4. 6 महीने की आयु के बाद जो भी बछड़ी वजन में अच्छी वृद्वि दिखाए उसे ही अच्छे डंग से पाले और जिसका वजन संतोष जनक ना हो उसे बेच दें।
5. नर बछड़े को 6 महीने के बाद ही बेच दें और बिकरी में दिक्क्त आए तो मुफ्त ही दे दें।
6. 6 महीने आयु के बाद बड़े पशुओं की तरह ही बछड़ियों को ताकतवर आहार शुरू करें।
7. पेट के कीड़ो की दवाई के इलावा 6 महीने की आयु में इन्हे भी बड़े पशुओ की तरह बीमारियों की रोकथाम के लिए रक्षक टिके लगवाएँ।
8. आज के दौर में एक दोगली किस्म की बछड़ी 15 - 18 महीने के बिच गर्मी में आ जाती है और घाबीन होने के बाद उसका भी ध्यान बड़े पशुओ की तरह ही रखें।
गाय या बैंस का बार - बार गर्मी में आना
कई बार देखा गया है कि कृत्रिम गर्भाधान के 21 - 22 दिन के बाद भी पशु बार बार गर्मी में आ जाते है और गाविन नहीं होते जिस से हमारी आमदनी पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इस परेशानी से निपटने के लिए हमे इसके कारणों की जानकारी होना आवशयक है
जिनका वर्णन निम्मनलिखित है
1. सही समय कृत्रिम गर्भधान न होना : - इस परेशानी से बचने के लिए गाय या बैंस को गर्मी में आने के बाद 12 - 18 घण्टे के बीच ही टिका करवाना चाहिए।
2. आवश्यक पोषक तत्व का आहार में बराबर मात्रा में ना होना भी इस परेशानी का कारण हो सकता है। इस के लिए पशु को संतुलित आहार जरूर दें जिसमे मिनरल मिक्सचर भी शामिल करें।
3. कई बार बच्चेदानी में सक्रमण होने के कारण पशु बार बार गर्मी में आते है। ऐसी अवस्था में निकटत्म पशु चिकिस्क कि सलाह अवश्य लें।
4. कई बार जेर (PLACENTA) समय पर नहीं गिरता है या हम थोड़ी ही देर प्रतीक्षा करने के बाद घवरा जाते है और जल्दबाजी में अनुभबहीन मनुष्य से जेर निकलवाते है। बच्चेदानी में जख्म और वाद में सक्रमण हो जाता है और पशु बार - बार गर्मी में आता है। ऐसा सक्रमण होने की अवस्था में अनुभवी पशु चिकित्स्क से अवश्य सलाह ले और उस से सही इलाज करवाएं ताकि ज्यादा घाटा ना हो।
यदि जेर खुद न गिरे तो 24 घण्टे से पहले उसे न निकलवाएं और निकटतम वेटनरी केंद्र के अनुभवी कर्मचारी से निकवाए।
5. कई बार हारमोन के असंतुलण / कमी के कारण यह परेशानी होती है जिसके लिए आवश्यक है कि हम वेटनरी चिकित्स्क की सलाह अवश्य लें।
चारे का सही उत्पादन
एक दुधारू पशु से अच्छा फायदा लेने के लिए उसे अच्छी देखभाल के साथ - साथ उसे अच्छा और संतुलित आहार प्रधान करना भी बहुत आवश्यक है। डेरी फार्म में अक्सर पाया गया है कि 60% - 70% खर्चा पशु के पोषण/ आहार पर आता है। अगर हम ज्यादा मात्रा और साल में ज्यादा देर तक अच्छे प्रकार का हरा चारा उपलब्ध करवा सकें तो इस से दूध के उत्पादन में वृद्धि होगी और फीड भी कम लगेगी जो की हमारी आमदनी में वृद्धि करने में सहायक सिद्ध हो सकता है। आज के दौर में चरागाहें भी कम हो चुके है और खेती बॉडी के लिए जमीन भी कम हो रही है। इसलिए हमें डेरी पशुओं के लिए अच्छे प्रकार की ज्यादा उत्पादन वाली हरे चारे कि फसले उगानी पड़ेगी।
आमतौर पर प्रांत का अधिकतर क्षेत्र असिचिंत है। तो ऐसी अवस्था में जब हमारे पास अतिरिक्त हरे चारे की फसल तैायर होती है उसे हम एक तरह आचार जिसे साइलेज कहते है कि शक्ल में सुरक्षित रख सकते है और जब जमीन में हरा चारा न हो उस समय उसका प्रयोग कर सकते है जिसका पोषक लगभग हरे चारे के जैसा होता है। साइलेज बनाने में ज्यादा खर्चा नहीं होता है केवल एक पशु चिकित्स्क की सलाह लेना जरुरी है। आज के दौर में बंजर जमीन में भी हरे चारे कि कुछ किसमें तैयार कि गई हैं। यह साल भर हरी रहती हैं। और उन्हें पानी की कम आवश्यकता होती है जैसे नेपियर है जिसे एक बार ऊगा लें तो 5 - 6 साल तक दोबारा उगाने की जरूरत नहीं पढ़ती और यह घास साल भर हरी रहती है न सिर्फ हरा चारा यह घास जमीन का कटाव भी रोकती है।
डेरी व्यवसाय और उसकी लगभकारिता
डेरी फार्म व्यवसाय से अधिक्तम लाभ लेने के लिए हमे निम्मनलिखित बातों की जानकारी होना बहुत आवशयक है।
1. जो भी अच्छी दोगली नस्ल की बछड़ि डेरी फार्म में त्यार होती है उसे 24 महीने आयु तक पहला बच्चा दे देना चाहिए और 60 से 90 दिन के भीतर दोबारा घावीन हो जाना चाहिए।
2. दुधारू पशु से ज्यादा लाभ प्राप्त करने के लिए उसकी बीमारियों से रोकथाम जरुरी है टीकाकरन की लागत इलाज से कई गुना कम होती है।
3. एक दुधारू गाय को 1 सु में लगभग 300 दिन दूध देना चाहिए और घाविन होने पर अंतिम 60 दिन में दूध बंद करना चाहिए
4. विशेष देखभाल बीमारियों को नियंत्रण में रखती है जिस से दूध के उत्पादन और लाभ में भी वृद्धि होती है। 5. दूध की सही विक्री सही दाम पर अच्छा लाभ होता है। और अगर इसमें दिक्क्त हो तो हमे चाहिए एक कोपरेटिव सोसाइटी बनाकर दूध की बिक्री करे। और अच्छा लाभ अर्जित करें ।
6. अगर कोई डेरी फार्म वढ़े नगर से दूर है और रोजाना भेजने पर खर्चा अधिक होता है तो ऐसी अवस्था में दूध की चीजें जैसे पनीर , कालड़ी , मखन घी , खोआ आदि तैयार करके नगर में भेजे और इससे अच्छा लाभ प्राप्त करे।
7. अगर हम डेरी फार्म के लिए साल भर अधिकत्म हरा चारा ऊगा सकें तो इस के दूध के उत्पादन में वृद्धि होगी जिस से अधिक लाभ बढ़ेगा।
8. अगर हम डेरी फार्म के गोबर और पेशाब का बैज्ञानिक ढंग से देसी खाद त्यार करें और अपने खेतो में सही मात्रा में ईसका प्रयोग करें तो उस से रसायिनीक खादों की कम जरूरत पड़ेगी और खेतो में फसल का उत्पादन भी बेहतर होगा और हमे आर्थिक लाभ में भी वृद्धि होगी।
9. डेरी फार्म में अगर गोवर गैस प्लांट लगवाए तो इस से हमारी बिजली और गैस की (L. P . G ) भी बचत होगी और पलांट के अंदर जो खाद तैयार होगी वह भी उच्च कोटि की खाद होगी।
10. आज के दौर में वर्मीकम्पोस्ट यानि कीड़ों से खाद तैयार करना का चलन बढ़ता जा रहा है जिसके लिए गोबर की ज़रूरत होती है अगर हम इसे अपने डेरी फार्म में त्यार करे इस से भी अच्छा लाभ हो सकता है यानि दूध के साथ - साथ गोबर की लाभ प्रदता / लाभकारिकता भी बढ़ जाती है।
धन्यवाद
जैसा की हम सब जानते है कि भारत की 70% जन्संख्या 2011 कि जनगणना के अनुसार गांव में रहती है और उसका गुजर बस्सर खेती और पशु पालन से होता है। खेती पशु पालन के लिए जरुरी है। और पशु पालन बिना खेती अधुरी है। खेतीबाड़ी से हमे खास मौसम पर ही फसल तैयार होने पर आमधणी प्राप्त होती है। जबकि पशु पालन से हमे लगातार आमधनी प्राप्त होती है। बड़ती जनसख्या के साथ हमारी जमीन खेती बाड़ी के लिए कम पड़ती जा रही है। तो यह जरुरी है की हम उच्च नसल के ही कम पशु पाल कर दूध की ज्यादा से ज्यादा पैदावार हासिल करें जिससे हमारी ग्रामीण जनसख्या को अच्छी खुराक दूध, दही, मक्खन, घी और लस्सी की सूरत उपलब्ध हो और पशु पालन से हमारे किसानों की अच्छी आमधनी भी प्राप्त होती है। दूध की ज्यादा उत्पादन हासिल करने के लिए सरकार की तरफ से पशु पालन विभाग बनाया गया है जिसकी वजह से भारत दुनियाभर में दूध के उत्पादन में प्रथम स्थान प्राप्त क्र चूका है।
अच्छी नस्ल के दुधारू पशु की पहचान उनकी देखभाल और उनसे दूध का अच्छा उत्पाधन प्राप्त करने के लिए जरुरी जानकारियाँ पशु पालन विभाग की तरफ से इस छोटी सी किताब में दी गयी है।
स्वस्थ पशु की निशानियाँ
एक पशु की अच्छी सेहत की निशानियाँ जानना बहुत जरुरी है। जोकि निम्मनलिखित व्यक्त की गई है।
1. स्वस्थ पशु की चमड़ी चमकीली और ढीली होनी चाहिए।
2. स्वस्थ पशु चुस्त और फुर्तीला होता है। और शेड (Shed ) में गैर जरुरी आवाज या शोर शराबा सुनने पर चौकन्ना हो जाता है।
3. स्वस्थ पशु अपने शरीर पर मक्खियाँ नहीं बैठने देता। और ऐसी हालत में वो अपनी दुम्ब हिला - हिला कर मक्खियॉं को बगा देता है।
4. स्वस्थ पशु की पीठ थप्पा - थ्प्पाने पर वो थर - थराता है।
5. स्वस्थ पशु के आगे समान्यता जो भी खुराक डाली जाती है वो सारी खा लेता है।
6. स्वस्थ पशु का नाक हमेशा गीला रहता है।
7. स्वस्थ पशु का शारीरिक तापमान 100 से 101 F होता है।
8. स्वस्थ पशु दिन में 15 - 20 kg नरम गोबर करता है।
9. स्वस्थ पशु का पिशाव हलके पीले रंग का रहता है।
ऊपर लिखी गई सभी बातों पर खास ध्यान रखना चाहिए और अगर उनमें कोई भी बदलाब दिखाई दे तो यूँ समझ लो कि जानवर को कोई तकलीफ जरूर है और उसकी जाँच निकटतम बेटनरी सेंटर से अव्श्य करायें।
अच्छे दुधारू पशु की पहचान
एक डेरी फार्म वाले को अपनी ही गायों या बैंसो का झुंड कृत्रिम गभार्धान (Artificial Insemination ) के द्वारा जो कि एक अच्छी नस्ल के बैल से तैयार किये जाते है से ही करना चाहिए। कई बार फोरी तौर पर हमे डेरी फार्म का काम करना है तो दुधारू पशु खरीदने पड़ते है तो ऐसी हालत में कुछ बातों का ध्यान रखना जरुरी है। जो निम्मनलिखित है।
1. हो सके तो जानवर की पहचान के लिए उसकी अच्छी तरह जाँच पड़ताल करें।
2. कोशिश करें की जानवर बुड्ढा ना हो और लगभग उसने दूसरी बार बच्चा दिया हो।
3. जानवर का पल्ला ध्यान से देखे और महसूस करे। महसूस करते वक्त वो हमे नरम और रुईवार (Spongy) लगना चाहिए।
4. जानवर खरीदने से पहले 3 दिन उसके दूध की परख कर लें और तब ही उसके दूध की औसत उत्पादन तय करे।
5. थन अपनी अपनी जगह पर बराबर दुरी पर हों और ज्यादा लम्बे न हों।
6. पल्ले से दिल की तरफ खून लेने वाली नाड़ियां जिन्हे आम तोर पर लोग दूध वाली नाड़ियाँ कहते है वो मोटि, लम्बी और टेडी मेडी होनी चाहिए।
7. पशु चुस्त, चमकीला और आँखों से होशियार लगना चाहिए और नाक गिला होना चाहिए।
8. पशु की चमड़ी नरम और पतली होनी चाहिए।
9. पशु न ज्यादा मोटा और ना ज्यादा दुबला होना चाहिए उसकी आखिर की तीन पसलियाँ दिखाई देनी चाहिए और छाती चौड़ी होनी चाहिए।
दुधारू पशु का पालन पोषण
दुधारू पशु के पालन पोषण की जरुरी बाते।
1. अच्छा माहौल 2. अच्छी देखभाल 3. अच्छी खुराक 4. बीमारीयों की रोकथाम
1. अच्छा माहौल :- दुधारू पशु से अच्छा फायदा लेने के लिए उसे अच्छा माहौल उपलब्ध करवाना जरुरी है। अच्छे माहौल के लिए अच्छे शेड (Shed ) का होना जरुरी है जिसके लिए निम्मनलिखित बाते ध्यान में रखे :
1. शेड का फर्श जमीन से थोड़ा ऊँचा होना चाहिए।
2. फर्श पक्का और खुरदुरा होना चाहिए।
3. फर्श पर उठने और बैठने के लिए जानवर को सही मात्रा में जगह मिलनी चाहीये।
4. एक दुधारू गाए को खड़ा होने के लिए लम्बाई में 7 फुट और चौड़ाई में 4 फुट जगह उपलब्ध होनी चाहिए। ७ फुट ९ इंच छोड़ी पक्की नाली गोबर और मूत्र के लिए जरुरी है।
5. जानवर के लिए खुरली (Manger ) पक्की होनी चाहिए।
6. दुधारू जानवर का शेड हवादार होना चाहिए।
7. इलाके के हिसाब से शेड की ऊंचाई होनी चाहिए।
8. शेड की दीवारे मुलायम होनी चाहिए जिसमे दरारे आदि ना हों।
9. दुधारू पशु को साफ पानी उपलब्ध करवाए।
दुधारू पशु कि सही देखभाल
1. दुधारू पशु के साथ दोस्ताना सलूक रखें।
2. पशु आपके सलूक से अच्छा अनुभब करें।
3. शेड का फर्श दूध लेने से पहले अछि तरह साफ़ करें।
4. पशु की साफ सफाई का खास ध्यान रखे।
5. दूध लेने से पहले दुधारू पशु के पल्ले (Udder ) को अच्छी तरह साफ़ पानी से धो ले और सुखा लें और अपने साफ़ हाथो से दूध लें।
6. दूध लेने के तुरन्त बाद गाय को खुराक डालें ताकि बह दूध देने के बाद तुरंत ना बैठे।
7. गाय का शरीर रोज़ाना ब्रश से साफ़ करें ताकि उसके शरीर पर जूं चिचड़ी आदि ना पड़े और गाय स्वस्थ रहे।
8. जब हम गाय से दूध लेते है तो इस बात का धयान रखे की पल्ला (Udder ) पूणर्ता खाली हो जाए और पूरा दूध लेने के लिए खास ध्यान रखे की दाएं हाथ से काम करने वाला मनुष्य दूध लेते वक्त गाय के बाएं तरफ और बाए हाथ से काम करने वाला मनुष्य गाय के दाएं तरफ बैठ कर दूध ले ताकि सारा दूध 8 मिनट के अंदर निकाला जा सके।
दुधारू पशु कि खुराक
1. एक दुधारू पशु से अच्छा दूध लेने के लिए उसे अच्छी खुराक दें।
2. जहां तक सम्भब हो दुधारू गाय को पेट भरकर हरा चारा खिलाएं।
3. हरा चारा न मिले तो दुधारू जानवर को अच्छे प्रकार का सूखा घास या साफ़ भूसा खिलाएं।
4. अच्छी प्रकार की संतुलित आहार का खास ख्याल रखे और 2 से 3 किलो ग्राम्स दूध के लिए 1 किलो संतुलित आहार खिलाएं।
5 एक दुधारू पशु को संतुलित आहार के अतिरिक्त दिन में 40 ग्राम्स मिनरल्स मिक्चर अवश्य खिलाएं।
6. खल खरीदने से पहले यह जान लें कि वह ज्यादा पुरानी ना हो , ओर उसे घर में गीली जगह पर ना रखे।
7. आहार के साथ- साथ दुधारू पशु के लिए दिन में 100 लीटर पानी की जरूरत होती है जिस से पीने ओर सफाई की जरूरत पूरी हो जाती है।
दुधारू पशुओं में बीमारियों की रोकथाम
कीटाणुओं से फैलने वाली बीमारिया :-
1. फर्रा रोग (black Quater ) : यह बीमारी आमतौर पर स्वस्थ जवान पशुओं में बरसात के दौरान पाई जाती है जिसमें तेज़ भुखार होना, टांग में लगड़ापन आना और उसी टांग के ऊपरी भाग में सूजन होना जिसे दवाने पर चर- चर की आवाज़ आना और तुरंत इलाज ना मिलने पर जानवर का मर जाना शामिल है। इस रोग से बचने के लिए आवशयक हे कि बरसात शुरू होने से पहले जानवरो को रक्षक टिके लगवाए जाएं।
2. गला घोट (H.S) :- यह रोग सभी आयू वर्ग के जानवरों में पाया जाता है। इसमें भी तेज भुखार होना , नमोनिया और दस्त लगना शामिल है। कभी कभार गले में सूजन होना जिस से सांस लेने में परेशानी आती है और तुरंत इलाज ना होने पर जानवर मर जाता है। इस रोग के निदान के लिए साल में दो बार रक्षक टीके (Vaccine) जरूर लगवाए।
3. मोखर (F. M. D) :- यह रोग एक कीटाणु (Virus ) से होता है जिसमें पशु के मुँह और खुरों में सूजन हो जाती है ओर छाले पड़ जाते है। अगर वरसात के मौसम में यह रोग हो जाएँ तो खुरो में कीड़े तक पड़ जाते है ओर दूध के उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है। इस रोग से आमदनी में बुरा प्रभाव पड़ता है ओर इस रोग के निदान लिए साल में दो बार रक्षक टिके (Vaccine ) लगवांएं।
आंतरिक ओर बाहरी कीड़ो की रोकथाम
आंतरिक ओर बाहरी कीड़ों की जानकारी एक दुधारू जानवर पालने वाले के लिए आज के दौर में बहुत आवश्यक है। अगर इस बात को महत्व न दिया जाए तो हम आर्थिक हानि का शिकार हो जाते है।
आंतरिक कीड़े दो प्रकार के होते है - एक जो अंतड़ियो में पाए जाते है और दूसरे वह जो जिगर में पाए जाते है। ऊपर वर्णित कीड़ों से आमतौर पर पशु दस्त का शिकार हो जाते हैं ,कमजोर भी हो जाते है जिस से दूध के उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है और कई बार पशु मर भी जाते है। आंतरिक कीड़ों की शिकायत के निदान के लिए आवश्यक कि हम जहां तक सम्भब हो सके साफ़ पानी पिलायें। पशु के कमजोर और सुस्त दिखने पर निकटतम चिकित्सालय में गोबर की जाँच करवाएँ और उसके अनुसार ही सही दवाई का प्रयोग वेटनरी कर्मचारी की सिफारिश पर ही करें ।
बाहरी कीड़े जैसे जूं, चिचड़, पिस्सू आदि भी दुधारू पशु के लिए काफी हानिकारक होते है यह जानवर का काफी खून चूस लेते है जिस से जानवर कमजोर हो जाते है। और दूध के उत्पादन में काफी गिरावट आ जाती है कई बार यह कीड़े दूसरे रोगों के कीटाणुओं को एक पशु से दूसरे पशु में फैलते है जिस से हमे भारी आर्थिक हानि होती है बाहरी कीड़ों के निदान के लिए शेड की सफाई का विशेष ध्यान रखे और पशु को रोजाना ब्रश से साफ़ करें, ब्रश हमेशा प्लास्टिक का ही प्रयोग करें अगर ध्यान रखने पर भी पशु बाहरी कीड़ो का शिकार हो जाते तो निकटतम पशु चिकित्सालय से जरूर सलाह लेकर सही दवाई दें।
मस्टाईटिस अर्थात पल्ले की सूजन
यह रोग आमतौर पर ज्यादा दूध देने वाले पशुओ में पाया जाता है और बढ़ती उमर के साथ इस रोग का ज्यादा प्रभाव होता है यह रोग कीटाणु और पल्ले की चोट लगने के कारण होता है। इस रोग से पल्ला (udder) सख्त हो जाता है जिस से दूध का उत्पादन कम हो जाता है और कई बार सुझा हुआ थन हमेशा के लिए बेकार हो जाता है।
अक्सर यह पाया गया है कि दूध लेने के बाद थन के सुराख़ को पूरी तरह से बन्द होने के लिए 15 -20 मिनट का समय लगता है जिस दौरान इस रोग के कीटाणु का हमला करने का अंदेशा / सम्भाबना रहती है।
आज के दौर में इस बीमारी कि जानकारी और रोकथाम डेरी वाले के लिए बहुत ही जरुरी है क्योकि इस बीमारी का सीधा प्रभाव दूध के उत्पादन पर पढ़ता है इससे हमारी आमदनी पूरी तरह से नष्ट हो जाती है।
रोकथाम की जरुरी बातें
1. पल्ले कि सफाई का ध्यान दूध लेने से पहले और दूध लेने के बाद जरूर रखें।
2. दूध लेने वाला मनुष्य अपने हाथों की सफाई का खास ध्यान रखें और साफ हाथों से दूध निकाले।
3. शेड में फर्श की सफाई का खास ध्यान रखे क्योकि गंदे फर्श पर कीटाणु का ज्यादा अंदेशा रहता है।
4. दूध लेने के तुरंत बाद जानवर को आहार जरूर डाले ताकि जानवर खाने के लिए खड़ी हालत में रहे और थानों के सुराखों को बंद होने तक का समय आराम से निकल जाए लगभग 15 - 20 मिनट का होता है
5. दूध की मात्रा में कोई परिवर्तन दिखाई दे तो निकटतम पशु चिकत्सालय से सलाह ले।
कृतिम गर्भाधान (Artifical Insemination)
कृतिम गर्भाधान के दुआरा हम देसी नस्ल यानि कम दूध देने वाली गायो या बैंसो में अच्छी नस्ल के बैलो के बीर्य द्वारा ज्यादा दूध देने वाली गायें और बैंसें तैयार कर सकते है। कृतिम गर्भाधान से हम एक अच्छी नसल के बैल का प्राकृतिक ढंग की तुलना में कई गुना ज्यादा बच्चे तैयार कर सकते है।
कृत्रिम गर्भाधान के लिए हमे यह जानकारी होना बहुत जरुरी है कि टिका (A . I ) कब करवाना चाहिए और दुधारू पशुओं में गर्मी के क्या लक्षण होते है।
एक गाय को बच्चा देने के बाद 60 - 90 दिन के भीतर कृत्रिम गर्भाधाम हो जाना चाहिए। यह तभी सम्भब है जब हम पशु की देखभाल और आहार का खास ध्यान रखे।
गाय जब बच्चा देती है तो लोग अक्सर उसको 21 दिन तक केवल सूखा घास ही खिलाते है जिस से वो पशु निर्बल हो जाता है गर्मी में देर से आता है। इसके फालसाबरूप हमारी आमदनी पर बुरा प्रभाव पड़ता है इसलिए इस रस्म को खत्म करने की जरूरत है और एक दुधारू गाय को बच्चा जनने के बाद अच्छी खुराक प्रधान की जानी चाहिए जिसमे मिनरल मिक्सचर का प्रयोग भी जरुरी है।
गाविन पशु की खास देखभाल
एक गाविन (Pregnent ) गाय की खास देखभाल की जरुरी बातें : -
1. आखरी दो महीनो में बच्चे का शरीर ज्यादा से ज्यादा बढ़ता है जिस के लिए आवशयक है कि आखिर के दो महीनो में गाय का दूध बंद किया जाए।
2. दूध एक दम बंद नहीं करना चाहिए।
3. दूध बंद करने के लिए पशु को खाल और फीड आदि ताकतवर आहार जैसे खल , फीड, मिनरल मिक्सचर आदि।
4. अगर पशु ज्यादा दूध देने वाला है और फीड बंद करने के बाद भी दूध नहीं बंद कर रहा है तो उसे कुछ दिन के लिए पानी भी काम कर दे ताकि वह दूध बंद कर दे।
5. जब पशु दूध देना बंद कर दे तो आहिस्ता - आहिस्ता तो उसको ताकतवर आहार जैसे खल , फीड , मिनरल मिक्सचर आदि शुरू करें ताकि पशु स्वस्थ बन सके और एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देने के साथ - साथ अच्छा दूध भी दें।
6. आखिर सप्ताह में ताकतवर आहार 2 किलोग्राम के करीब कर दे ताकि जानवर बदहजमी का शिकार न हो जाए।
7. आखिर के 2 महीने में जब पशु ज्यादा भारी होने लगता है उसका खास ध्यान रखे। उसे दूसरे पशु से अलग कर देना चाहिए और सूखा घास बिस्तर के तोर पर उसके नीचे डालना चाहिए ताकि उठते समय फिसल न जाए।
8. रोज़ाना उसे ब्रश से साफ करे इससे पशु अच्छा आराम करता है।
9. गाय का बच्चा जनने का समय नजदीक आता है तो वह ज्यादा भारी लगने लगती है थन और पल्ला काफी बढ़ जाते है। और पल्ला काफी डिला हो जाता हैं तो उस समय ज्यादा से ज्यादा ध्यान दें और पशु को उची - नीची जगह पर चढ़ाई और उतराई से परहेज़ रखें।
दुधारू गाय और भैंस में गर्मी के लक्षण
1. पशु आहार खाना बंद कर देता है।
2. एक विशेष प्रकार की आवाज़ दिन भर निकालता रहता है।
3. पेशाव वाली जगह थोड़ी सूजी हुई लगती है।
4. पेशाव के रास्ते एक विशेष प्रकार की बेरंग सी तार निकलती है।
5. पशु बार- बार पेशाव करता है
6. गाय दूसरे पशुओं पर उछलती है और दूसरे पशुओ को अपने ऊपर उछलने के लिए बेताब रहती है।
7. उस दिन पशु कम दूध देता है
8. पशु के थन दिनभर भरे - भरे से लगते है।
9. भैंस ज्यादातर सर्दी के मौसम में गर्मी में आती है और अपनी गर्दन उठाकर दिनभर विशेष प्रकार की आवाज़ करती है और गाय की तुलना में लगातार थोड़ा - थोड़ा पेशाव करती रहती है।
ऊपर लिखे गए सारे लक्षण तभी देखने को मिलेंगे जब दुधारू पशु की देखभाल और आहार को हम प्राथमिकता दे।
जब पता चल जाए कि पशु गर्मी में आया है तो उसके बाद 12 से लेकर 18 घण्टे के भीतर कृत्रिम गर्भधान (A. I) करवाना चाहिए।
बछड़ो की देखभाल
एक बछड़े की सही सुरक्षा और देखभाल उसके जन्म से दो महीने पहले ही शुरू हो जाती है जब हम उसकी माँ के अच्छे आहार और देखभाल को महत्व देते है।
2. जन्म लेते ही बछड़े को खुरदुरे कपडे से साफ कर लेना चाहिए।
3. मुँह और नाक को अच्छी तरह साफ करें ले ताकि उसे साँस लेने में परेशानी न हो।
4. बछड़े को साफ़ और सुथरी जगा पर रखें।
5. सर्दी के मौसम में बछड़े को सर्दी से बचाएँ।
6. बछड़े का नाडु (नाभि) अगर ज्यादा लम्बा हो तो उसे लगभग एक इंच छोड़ कर साफ कैंची से काट ले और उस पर विटाडीन (Bitadine) नाम की दवाई लगा दें।
7. बछड़े को 1 घण्टे के अंदर ही माँ का पहला दूध पिलायें जिस से वह रोगरहित रहे और यह दूध अंतड़ियां साफ़ करने में सहायक सिद्ध होता है। और बछड़े के शरीर को रोगों से लड़ने में सहायक होता है।
8. बछड़े को पहले महीने वजन के 10 % के हिसाब से दूध पिलाएं दूसरे महीने 7 % और तीसरे महीने 5% के हिसाब से दूध पिलायें।
9. बछड़े को 10 -15 दिन के भीतर सींग निकलना बंद करवा दें। यह काम वेटनरी कर्मचारी से ही करवाएं।
10. बछड़े को 2 महीने की आयु में कीड़ें की दवाई (Deworming) अवश्य दें। भैंस के बच्चे को पहले ही महीने आंतरिक कीड़ो की दवाई दें।
डेरी फार्म के अंदर नए दुधारू पशु तैयार करना।
अक्सर देखा गया है कि चार सू (Lactation ) के बाद गाय का दूध कम होने लगता है और हमारी आमदनी में कमी आने लगती है। इसलिए बेहतर है कि आज के युग में पशु खरीद कर लाने के बदले अपने ही पशु त्यार किए जाएं । इसके लिए निम्मनलिखित बातों को ध्यान में रखें।
1. डेरी फार्म के अंदर छोटे बछड़ो विशेष रूप बछड़ियों के स्वस्थ का खास ध्यान रखे। दूध की मात्रा बछड़ो के बजन के अनुसार ही हो न कम ना ज्यादा।
2. 15 दिन की आयु से बछड़ियों को विशेष प्रकार की आहार आहिस्ता - आहिस्ता शुरू करना चाहिए जिसका फार्मूला है - मक्की 55 %, खल 35 % गदम का बुरा 8 % और मिनरल मिक्सचर 2 % और इस आहार को हम काफ सटाटर कहते है।
3. काफ स्टार्टर 15 दिन की आयु से प्रतिदिन 10 ग्राम्स की मात्रा से दें और आहिस्ता - आहिस्ता बढ़ाते जाए ताकि 6 महीने की आयु तक 1 किलो की मात्रा हो जाए।
4. 6 महीने की आयु के बाद जो भी बछड़ी वजन में अच्छी वृद्वि दिखाए उसे ही अच्छे डंग से पाले और जिसका वजन संतोष जनक ना हो उसे बेच दें।
5. नर बछड़े को 6 महीने के बाद ही बेच दें और बिकरी में दिक्क्त आए तो मुफ्त ही दे दें।
6. 6 महीने आयु के बाद बड़े पशुओं की तरह ही बछड़ियों को ताकतवर आहार शुरू करें।
7. पेट के कीड़ो की दवाई के इलावा 6 महीने की आयु में इन्हे भी बड़े पशुओ की तरह बीमारियों की रोकथाम के लिए रक्षक टिके लगवाएँ।
8. आज के दौर में एक दोगली किस्म की बछड़ी 15 - 18 महीने के बिच गर्मी में आ जाती है और घाबीन होने के बाद उसका भी ध्यान बड़े पशुओ की तरह ही रखें।
गाय या बैंस का बार - बार गर्मी में आना
कई बार देखा गया है कि कृत्रिम गर्भाधान के 21 - 22 दिन के बाद भी पशु बार बार गर्मी में आ जाते है और गाविन नहीं होते जिस से हमारी आमदनी पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इस परेशानी से निपटने के लिए हमे इसके कारणों की जानकारी होना आवशयक है
जिनका वर्णन निम्मनलिखित है
1. सही समय कृत्रिम गर्भधान न होना : - इस परेशानी से बचने के लिए गाय या बैंस को गर्मी में आने के बाद 12 - 18 घण्टे के बीच ही टिका करवाना चाहिए।
2. आवश्यक पोषक तत्व का आहार में बराबर मात्रा में ना होना भी इस परेशानी का कारण हो सकता है। इस के लिए पशु को संतुलित आहार जरूर दें जिसमे मिनरल मिक्सचर भी शामिल करें।
3. कई बार बच्चेदानी में सक्रमण होने के कारण पशु बार बार गर्मी में आते है। ऐसी अवस्था में निकटत्म पशु चिकिस्क कि सलाह अवश्य लें।
4. कई बार जेर (PLACENTA) समय पर नहीं गिरता है या हम थोड़ी ही देर प्रतीक्षा करने के बाद घवरा जाते है और जल्दबाजी में अनुभबहीन मनुष्य से जेर निकलवाते है। बच्चेदानी में जख्म और वाद में सक्रमण हो जाता है और पशु बार - बार गर्मी में आता है। ऐसा सक्रमण होने की अवस्था में अनुभवी पशु चिकित्स्क से अवश्य सलाह ले और उस से सही इलाज करवाएं ताकि ज्यादा घाटा ना हो।
यदि जेर खुद न गिरे तो 24 घण्टे से पहले उसे न निकलवाएं और निकटतम वेटनरी केंद्र के अनुभवी कर्मचारी से निकवाए।
5. कई बार हारमोन के असंतुलण / कमी के कारण यह परेशानी होती है जिसके लिए आवश्यक है कि हम वेटनरी चिकित्स्क की सलाह अवश्य लें।
चारे का सही उत्पादन
एक दुधारू पशु से अच्छा फायदा लेने के लिए उसे अच्छी देखभाल के साथ - साथ उसे अच्छा और संतुलित आहार प्रधान करना भी बहुत आवश्यक है। डेरी फार्म में अक्सर पाया गया है कि 60% - 70% खर्चा पशु के पोषण/ आहार पर आता है। अगर हम ज्यादा मात्रा और साल में ज्यादा देर तक अच्छे प्रकार का हरा चारा उपलब्ध करवा सकें तो इस से दूध के उत्पादन में वृद्धि होगी और फीड भी कम लगेगी जो की हमारी आमदनी में वृद्धि करने में सहायक सिद्ध हो सकता है। आज के दौर में चरागाहें भी कम हो चुके है और खेती बॉडी के लिए जमीन भी कम हो रही है। इसलिए हमें डेरी पशुओं के लिए अच्छे प्रकार की ज्यादा उत्पादन वाली हरे चारे कि फसले उगानी पड़ेगी।
आमतौर पर प्रांत का अधिकतर क्षेत्र असिचिंत है। तो ऐसी अवस्था में जब हमारे पास अतिरिक्त हरे चारे की फसल तैायर होती है उसे हम एक तरह आचार जिसे साइलेज कहते है कि शक्ल में सुरक्षित रख सकते है और जब जमीन में हरा चारा न हो उस समय उसका प्रयोग कर सकते है जिसका पोषक लगभग हरे चारे के जैसा होता है। साइलेज बनाने में ज्यादा खर्चा नहीं होता है केवल एक पशु चिकित्स्क की सलाह लेना जरुरी है। आज के दौर में बंजर जमीन में भी हरे चारे कि कुछ किसमें तैयार कि गई हैं। यह साल भर हरी रहती हैं। और उन्हें पानी की कम आवश्यकता होती है जैसे नेपियर है जिसे एक बार ऊगा लें तो 5 - 6 साल तक दोबारा उगाने की जरूरत नहीं पढ़ती और यह घास साल भर हरी रहती है न सिर्फ हरा चारा यह घास जमीन का कटाव भी रोकती है।
डेरी व्यवसाय और उसकी लगभकारिता
डेरी फार्म व्यवसाय से अधिक्तम लाभ लेने के लिए हमे निम्मनलिखित बातों की जानकारी होना बहुत आवशयक है।
1. जो भी अच्छी दोगली नस्ल की बछड़ि डेरी फार्म में त्यार होती है उसे 24 महीने आयु तक पहला बच्चा दे देना चाहिए और 60 से 90 दिन के भीतर दोबारा घावीन हो जाना चाहिए।
2. दुधारू पशु से ज्यादा लाभ प्राप्त करने के लिए उसकी बीमारियों से रोकथाम जरुरी है टीकाकरन की लागत इलाज से कई गुना कम होती है।
3. एक दुधारू गाय को 1 सु में लगभग 300 दिन दूध देना चाहिए और घाविन होने पर अंतिम 60 दिन में दूध बंद करना चाहिए
4. विशेष देखभाल बीमारियों को नियंत्रण में रखती है जिस से दूध के उत्पादन और लाभ में भी वृद्धि होती है। 5. दूध की सही विक्री सही दाम पर अच्छा लाभ होता है। और अगर इसमें दिक्क्त हो तो हमे चाहिए एक कोपरेटिव सोसाइटी बनाकर दूध की बिक्री करे। और अच्छा लाभ अर्जित करें ।
6. अगर कोई डेरी फार्म वढ़े नगर से दूर है और रोजाना भेजने पर खर्चा अधिक होता है तो ऐसी अवस्था में दूध की चीजें जैसे पनीर , कालड़ी , मखन घी , खोआ आदि तैयार करके नगर में भेजे और इससे अच्छा लाभ प्राप्त करे।
7. अगर हम डेरी फार्म के लिए साल भर अधिकत्म हरा चारा ऊगा सकें तो इस के दूध के उत्पादन में वृद्धि होगी जिस से अधिक लाभ बढ़ेगा।
8. अगर हम डेरी फार्म के गोबर और पेशाब का बैज्ञानिक ढंग से देसी खाद त्यार करें और अपने खेतो में सही मात्रा में ईसका प्रयोग करें तो उस से रसायिनीक खादों की कम जरूरत पड़ेगी और खेतो में फसल का उत्पादन भी बेहतर होगा और हमे आर्थिक लाभ में भी वृद्धि होगी।
9. डेरी फार्म में अगर गोवर गैस प्लांट लगवाए तो इस से हमारी बिजली और गैस की (L. P . G ) भी बचत होगी और पलांट के अंदर जो खाद तैयार होगी वह भी उच्च कोटि की खाद होगी।
10. आज के दौर में वर्मीकम्पोस्ट यानि कीड़ों से खाद तैयार करना का चलन बढ़ता जा रहा है जिसके लिए गोबर की ज़रूरत होती है अगर हम इसे अपने डेरी फार्म में त्यार करे इस से भी अच्छा लाभ हो सकता है यानि दूध के साथ - साथ गोबर की लाभ प्रदता / लाभकारिकता भी बढ़ जाती है।
धन्यवाद
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